असम का मानस राष्ट्रीय उद्यान भारत की जैव विविधता का अनमोल खज़ाना है। यह न केवल एक यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है बल्कि दुनिया में पाई जाने वाली दुर्लभ प्रजातियों जैसे पिग्मी हॉग, गोल्डन लंगूर और असम रूफ्ड टर्टल का एकमात्र सुरक्षित आवास भी है। इसकी महत्ता पर्यावरणीय संतुलन, सांस्कृतिक विरासत और वैश्विक संरक्षण प्रयासों से जुड़ी है।

स्थान और इतिहास

मानस राष्ट्रीय उद्यान असम और भूटान की सीमा पर हिमालय की तलहटी में स्थित है।

इसका नाम मानस नदी से पड़ा है, जो ब्रह्मपुत्र की सहायक नदी है और उद्यान के बीच से बहती है।

1928 में इसे वन्यजीव अभयारण्य घोषित किया गया और 1985 में यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल का दर्जा मिला।

जैव विविधता

उद्यान में 55 स्तनधारी प्रजातियाँ, 380 पक्षी प्रजातियाँ, 50 सरीसृप और 3 उभयचर प्रजातियाँ पाई जाती हैं।

यहाँ की विशेष प्रजातियाँ:

पिग्मी हॉग – दुनिया का सबसे छोटा जंगली सूअर, केवल यहीं पाया जाता है।

गोल्डन लंगूर – दुर्लभ प्राइमेट, केवल मानस और भूटान के कुछ हिस्सों में।

असम रूफ्ड टर्टल – संकटग्रस्त कछुआ प्रजाति।

बंगाल फ्लोरिकन – गंभीर रूप से संकटग्रस्त पक्षी।

वन्यजीव संरक्षण

यहाँ बाघ, तेंदुआ, क्लाउडेड लेपर्ड, एशियाई गोल्डन कैट, जंगल कैट, फिशिंग कैट और मार्बल्ड कैट जैसी आठ दुर्लभ बिल्ली प्रजातियाँ पाई जाती हैं।

भारतीय गैंडे को भारी शिकार के कारण यहाँ से समाप्त कर दिया गया था, लेकिन 2007 में पुनः स्थापित किया गया।

पर्यावरणीय और वैश्विक महत्व

मानस राष्ट्रीय उद्यान को बायोस्फीयर रिज़र्व घोषित किया गया है और यह महत्वपूर्ण पक्षी क्षेत्र भी है।

यह भारत-भूटान सीमा पर स्थित होने के कारण ट्रांस-बाउंड्री इकोसिस्टम का हिस्सा है, जो अंतरराष्ट्रीय संरक्षण प्रयासों के लिए अहम है।

1992 में इसे "खतरे में विश्व धरोहर स्थल" की सूची में डाला गया था, लेकिन 2011 में संरक्षण प्रयासों के बाद इसे हटाया गया।

चुनौतियाँ

अवैध शिकार और अतिक्रमण अब भी बड़ी समस्या हैं। हाल ही में गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने अतिक्रमण रोकने के लिए आदेश दिया है।

आक्रामक प्रजातियाँ और जलविद्युत परियोजनाएँ भी उद्यान की पारिस्थितिकी पर असर डाल रही हैं।