मन की बात तो आपने सुनी होगी आज के प्रसंग में हम आपको जुम्'मन' की बात सुनाएंगे। जुम्मन मियां को बाल्यावस्था से ही मन की बात कहने का शौक था। हो भी क्यों न, आखिर बतकही में पूरे क्षेत्र में उनका जोड़ नहीं था। अब्बु और अम्मी के शासन काल में भी सभी तरह की बातें करते थे किंतु कभी मन की बात नहीं कर सकें। वैसे भी बाप के होटल में गुजारा करने वालों की कोई सुनता नहीं। किशोरावस्था में बगलें और नाक के नीचे वाले हिस्सों में छोटे-छोटे बाल उगना शुरु हुआ तो स्कूल और कॉलेज की महिला सहपाठी से ईलू टाईप मन की बात कहने की इच्छा बलवती हुई किंतु बेरोज़गारो की जब अल्लाह नहीं सुनता तो महिला मित्र क्या खाक सुनेंगी! यह विचार मन में आते ही जुम्मन चचा के मन के उपवन में मन की बात दफ़न होकर रह गई। डिग्री हासिल होने पर घरवालों से यूपीएससी तैयारी करने की मन की बात शेयर करना चाहता था किंतु सीमित आय वाले पिता सुलेमान दर्ज़ी के सामने मन की मर्जी वाली अर्जी दायर नहीं कर पाएं। फलस्वरूप सरकारी दफ्तर में कार्यालय परिचारी बन कर रह गए। आपको पता ही है कि कर्मचारी से अधिकारी तक सबकी सुनने वाले की बात भला कोई सुनता है क्या? स्थिति और परिस्थिति के कारण बातों की खेती करने वाले जुम्मन चचा के अंदर की प्रतिभा मृतप्राय होने लगी। नौकरी लगी नहीं कि निकाह के लिए रिश्ते आना शुरू हो गए। पतली,कमसिन और हसीन बेगम की इच्छा पालने वाले जुम्मन मियां शर्म और हया के कारण इस बार भी घरवालों से मन की बात कह सकने में असफल रहे।नतीजतन भारी-भरकम दहेज के साथ पौने तीन गुना भारी भरकम वजन वाली एमन बेगम से उनका कुबुलनामा पढ़वा दिया गया। निकाह के बाद मन की बात करना तो दूर मन की बात सोचना भी जुम्मन के लिए दूभर हो गया। कार्यालय एवं घरेलू कार्य की संयुक्त जिम्मेदारी जो मिल गई थी।विगत बाइस वर्षों से जुम्मन की घर गृहस्थी में एमन की बात ही कहीं, सुनी और मानी जाने लगी। एक दिन की बात है, जुम्मन सूजे हुए चेहरा के साथ लंगड़ाता हुआ अल्प संसद के उपनाम से प्रसिद्ध असलम के चाय दुकान पर पहुंचा।ढुलमुल अर्थव्यवस्था की तरह चचा की अवस्था को देख कर "कब, कहां, कैसे" के संबोधन के साथ मुफ्त की अखबार पढ़ने और चाय की चुस्की के बीच खबरों का स्थानीय पोस्टमार्टम करने वाले बुद्धिजीवी पूछ बैठे- अरे ये क्या हो गया चचा जान ? जुम्मन ने गहरी सांस लेते हुए जवाब दिया -"अब क्या बताऊं भाई।कल दोपहर में तुम्हारी चाची जान के लिए चाय बनाया था... तो क्या चाय सही नहीं बनने के कारण चाची ने खातिरदारी कर डाली? भीड़ में से किसी ने चुटकी ली। चचा खीजते हुए बोले-बिना बात के बेतिया मत बनो यार,पूरी बात सुनते नहीं कि लहेरियासराय बन बीच में लहराने लगते हो। मोकामा की तरह मौन होकर चुपचाप सुन नहीं सकते क्या भाई! मामले की गम्भीरता देखते हुए असलम चाय वाले ने अपनी बात रखी। असलम की बात सुन सभी खामोशी से चचा को मुखातिब हुए। ...हां तो बची हुई अवशेष चाय को सुरक रहा था कि घर की दीवार पर टंगे ससुराल से सहायता प्राप्त चौबीस इंच वाले एलईडी पर अचानक छप्पन इंच वाले पुरुष प्रकट हो गए। यानी न्यूज चैनल पर संयुक्त राष्ट्र में पीएम के मन की बात का लाइव प्रसारण होने लगा। कार्यक्रम देख मेरे मन के अंदर भी कई बातें एक साथ उफान मारने लगा। यह सोचकर मेरा मन मुझे धिक्कारने लगा कि एक हमारे पीएम साहब हैं जो संयुक्त राष्ट्र से अपने मन की बात कर रहे हैं और एक मैं हूं जो स्वयं के घर में भी मन बात नहीं कर सकता!कार्यक्रम देखते हुए मुझे प्रेरणा और हौसला का बूस्टर डॉज प्राप्त हुआ। चाय की अंतिम चुस्की के साथ मन ही मन प्रण किया कि आज मैं भी हर हाल में मन की बात कह कर रहूंगा। फिर क्या, टीवी बंद कर बेगम के सामने मैं मन की बात करने लगा। उसके बाइस वर्षीय इमोशनल अत्याचार और ससुराल के हस्तक्षेप वाली त्रासदी पर खुलकर मन की बात कहने लगा।अभी मेरे मन की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि तुम्हारी चाची ने जमकर मेरी सुताई कर दी... कल पुनः मुझे घरेलू हिंसा का शिकार होना पड़ा। चाय की ग्लास से निकल रहे भांप को चेहरे के सूजन क्षेत्र की ओर ले जाते हुए चचा ने अपनी पुरी व्यथा सुनाई। ओह... एक साथ सहानुभूति के स्वर चाय दुकान पर गूंज उठी। लेकिन भाई कल का कार्यक्रम देख मुझे एक बात की शिक्षा जरूर मिल गई... "यही कि पीएम की नकल नहीं करनी चाहिए! " चचा की बात पुरी होने से पहले ही बेंच पर बैठा उस्मान ने अति उत्साह में अपना विचार व्यक्त किया। अरे नहीं मियां... लंबी सांस लेते हुए जुम्मन चचा बोले- यदि बेगम साथ ना हो तो बंदा संयुक्त राष्ट्र में भी मन की बात कर सकता हैं और यदि बेगम साथ हो तो घर के अंदर भी मन की बात करना मयस्सर नहीं...

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