Gen Z यानी 1997 से 2012 के बीच जन्मी पीढ़ी ने राजनीति और सत्ता प्रतिष्ठानों को चुनौती देने का तरीका पूरी तरह बदल दिया है। यह पीढ़ी डिजिटल युग में पली-बढ़ी है और सोशल मीडिया, वैश्विक नेटवर्किंग तथा विकेंद्रीकृत संगठन के माध्यम से अपनी आवाज़ बुलंद कर रही है।

Gen Z की राजनीतिक विशेषताएँ

डिजिटल संगठन: WhatsApp, Instagram और Twitter जैसे प्लेटफ़ॉर्म पर तेज़ी से जुटान।

विकेंद्रीकरण: पारंपरिक पार्टी नेतृत्व से बाहर निकलकर स्वतःस्फूर्त आंदोलन।

वैश्विक नेटवर्किंग: लंदन, बर्लिन और न्यूयॉर्क तक प्रदर्शन और अंतरराष्ट्रीय दबाव।

नए नारे: “जय संविधान”, “जय भीम” जैसे लोकतांत्रिक एजेंडे पर आधारित नारे।

वैश्विक उदाहरण

बांग्लादेश (2024): छात्र विरोध से प्रधानमंत्री शेख हसीना को इस्तीफा देना पड़ा।

श्रीलंका (2022): आर्थिक संकट के बीच युवाओं ने राष्ट्रपति राजपक्षे को सत्ता छोड़ने पर मजबूर किया।

केन्या (2026): कर वृद्धि के खिलाफ आंदोलन ने राष्ट्रपति विलियम रुटो को वित्त विधेयक वापस लेने पर मजबूर किया।

भारत का परिदृश्य

भारत में Cockroach Janta Party (CJP) जैसे छात्र आंदोलनों ने दिखाया कि सोशल मीडिया पर लाखों फॉलोअर्स जुटाकर सत्ता को चुनौती दी जा सकती है। यह आंदोलन धार्मिक ध्रुवीकरण से हटकर लोकतांत्रिक एजेंडे पर केंद्रित रहे।

चुनौतियाँ और जोखिम

हिंसक दमन: पुलिस और सुरक्षा बलों द्वारा लाठीचार्ज और गिरफ्तारी।

स्थायित्व की कमी: तात्कालिक बदलाव के बाद दीर्घकालिक सुधार सीमित।

युवा मोहभंग: लोकतंत्र से निराशा के बावजूद विरोध में सबसे आगे।

दीर्घकालिक प्रभाव

Gen Z की राजनीति ने यह स्पष्ट कर दिया है कि लोकतंत्र अब केवल संसद और राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं है। यह पीढ़ी डिजिटल माध्यमों से सत्ता को चुनौती देती है और वैश्विक स्तर पर दबाव बनाने की क्षमता रखती है। हालांकि, स्थायित्व और संस्थागत सुधार की कमी इनके आंदोलनों को सीमित कर सकती है।