कलाकार
विक्की कौशल , रश्मिका मंदाना , अक्षय खन्ना , आशुतोष राणा , नील भूपलम , विनीत सिंह , डायना पेंटी और दिव्या दत्ता आदि
लेखक
लक्ष्मण उतेकर , ऋषि विरमानी , कौस्तुभ सावरकर , उनमान बंकर , इरशाद कामिल और ओंकार महाजन
मुंबई फिल्म इंडस्ट्री में ऐसा कम ही देखने को मिलता है कि दो बड़ी फिल्मों के प्रेस शो एक ही समय पर रखे जाएं। लेकिन, इस बार शायद मामला अहं के टकराव का था। मैडॉक फिल्म्स की फिल्में आमतौर पर जियो स्टूडियोज के साथ रिलीज होती रही हैं, लेकिन उनकी नई फिल्म ’छावा’ का जियो स्टूडियोज से कोई संबंध नहीं है। वहीं, जियो स्टूडियोज का संबंध दूसरी फिल्म ’कैप्टन अमेरिका: ब्रेव न्यू वर्ल्ड’ से है, जो मार्वल स्टूडियो के बैनर तले बनी है, लेकिन जिसे भारत में जियो के स्वामित्व में आ चुकी डिज्नी इंडिया ने रिलीज किया है। सिनेमा में ऐसे अहं के टकराव और भी देखने को मिल सकते हैं, क्योंकि वैलेंटाइंस डे से डिज्नी प्लस हॉटस्टार और जियो सिनेमा ऐप मिलकर अब जियो हॉटस्टार बन चुके हैं।
शंभू राजे के जीवनवृत्त पर बनी फिल्म
फिल्म को आखिर तक देखने के लिए सच में बड़ा जिगरा चाहिए। महाराष्ट्र के लोगों के लिए इस फिल्म को देखने का प्रमुख कारण यह है कि यह उनके पूज्य शिवाजी महाराज के बेटे, संभाजी महाराज की कहानी पर आधारित है।
संभाजी महाराज, जिन्हें शंभू राजे के नाम से भी जाना जाता है, की बायोपिक को देखने का उत्साह महाराष्ट्र में सबसे अधिक है। एडवांस बुकिंग के आंकड़े बताते हैं कि महाराष्ट्र के लोगों में इस फिल्म को लेकर जबरदस्त रुचि है।
संभाजी महाराज मराठा साम्राज्य के एक वीर योद्धा और महान नेता थे। उन्होंने अपने पिता शिवाजी महाराज की मृत्यु के बाद मराठा साम्राज्य को संभाला और मुगलों सहित कई दुश्मनों से लोहा लिया। उनके शौर्य और बलिदान की गाथाएं महाराष्ट्र के लोगों के दिलों में बसी हुई हैं।
फिल्म में संभाजी महाराज के जीवन, उनकी उपलब्धियों और संघर्षों को बड़े परदे पर जीवंत रूप में प्रस्तुत किया गया है। यह फिल्म न केवल उनके वीरता को दर्शाती है, बल्कि उनकी मानवीय गुणों और व्यक्तिगत जीवन को भी सामने लाती है।
नई पीढ़ी को संभाजी महाराज की अद्भुत कहानी से परिचित कराने का यह एक अद्वितीय अवसर है। यही कारण है कि महाराष्ट्र के लोग इस फिल्म को बड़ी उत्सुकता और आदर के साथ देख रहे हैं।
मराठी में शेर के बच्चे को ’छावा’ कहते हैं
मराठी में शेर के बच्चे को ’छावा’ कहा जाता है। अगर आपने शिवाजी सावंत के लिखे पौराणिक उपन्यास ’मृत्युंजय’ और ’युगंधर’ पढ़े हैं, तो आप जानते होंगे कि उन्होंने किस कुशलता से तथ्य को कथा में घोल दिया है। ऐसे में उनके लिखे ऐतिहासिक उपन्यास ’छावा’ पर आधारित इस फिल्म में कितना उनका योगदान है, कितना फिल्म निर्माताओं ने डिस्क्लेमर के अनुसार अपनी कल्पना से जोड़ा है और कितने इसके तथ्य सही हैं, यह कहना मुश्किल है।
फिल्म ’छावा’ में संभाजी महाराज की कहानी को प्रमुखता से प्रस्तुत किया गया है। पूरी फिल्म में संभाजी को युद्ध करते हुए दिखाया गया है, जहाँ वह अपने शत्रुओं को बिना किसी रियायत के मारते हैं और लड़ाई के दौरान कई बार भेस बदलते हैं। कहानी का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि औरंगजेब दिल्ली से निकला है संभाजी को पकड़ने के लिए।
संभाजी महाराज को रायगढ़ की गद्दी शिवाजी महाराज के स्वर्गवास के बाद मिली थी। यह फिल्म संभाजी और औरंगजेब के नौ साल के संघर्ष पर आधारित है, जो 1680 से 1689 के बीच का कालखंड है। यह कालखंड दुखांत है और उसमें दुखांत के साथ-साथ अत्यंत भयावह घटनाएँ भी शामिल हैं।
फिल्म में दिखाया गया है कि संभाजी महाराज ने अपने जीवन के अंतिम नौ वर्षों में किस प्रकार से अपने राज्य और अपनी प्रजा की रक्षा की। वह एक महान योद्धा थे, जिन्होंने अपनी वीरता और शौर्य से मराठा साम्राज्य को मजबूत किया। फिल्म में उनकी लड़ाईयों और रणनीतियों को बड़े परदे पर जीवंत रूप में प्रस्तुत किया गया है।
फिल्म के विषय पर विभिन्न दृष्टिकोण हो सकते हैं, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि ’छावा’ एक ऐतिहासिक फिल्म है जो दर्शकों को संभाजी महाराज के जीवन और उनकी वीरता से परिचित कराती है।
क्लाइमेक्स जरूरत से ज्यादा वीभत्स
फिल्म ’छावा’ देखने से पहले अपने बच्चों और घर की महिलाओं के साथ इसे देखने के बारे में दो बार जरूर सोचें। पूरी फिल्म में मुख्य अभिनेता विक्की कौशल का वीर और रौद्र रूप दिखाया गया है, लेकिन फिल्म का क्लाइमेक्स कुछ ऐसा वीभत्स रस उत्पन्न करता है, जैसे कि फिल्म ’पैशन ऑफ क्राइस्ट’ में ईसा मसीह को सूली पर लटकाकर उन्हें तिल-तिल की यातना देने के समय परदे पर रचा गया था।
फिल्म में औरंगजेब को बेइज्जत करने के लिए बार-बार ’औरंग’ के नाम से बुलाया जाता है। उसके बेटे अकबर को दिखाया गया है कि वह संभाजी की मदद के लिए बार-बार गुहार लगाता है। स्वराज का झंडा ऊंचा करने में वह भी संभाजी का साथ देना चाहता है, लेकिन उसके पिता शहंशाह औरंगजेब उसकी राह का रोड़ा बनते हैं।
फिल्म में औरंगजेब की बेटी को भी दिखाया गया है, जो अपने पिता से भी ज्यादा जालिम है। वह कैद में आए संभाजी को तड़पा-तड़पा कर मारने का आनंद लेती है।
संभाजी की पत्नी के भाइयों ने की गद्दारी
फिल्म का क्लाइमेक्स तीन महत्वपूर्ण बातें उजागर करता है।
पहली बात यह है कि जीवन उतना ही है जितना हम जीना चाहते हैं, और गरिमा के साथ जीना सबसे महत्वपूर्ण है। किसी के सामने घुटनों के बल गिड़गिड़ाने से बेहतर है कि मौत को गले लगाया जाए। इसी संदर्भ में, औरंगजेब की बेटी कहती है कि वह अपनी मौत का जश्न मनाकर चला गया और हमें अपनी जिंदगी का मातम मनाने के लिए छोड़ गया।
दूसरी बात यह है कि संभाजी की पत्नी के दोनों भाई गद्दार निकले, और न केवल वे, बल्कि मराठा साम्राज्य के कई सूबेदारों ने भी संभाजी के साथ गद्दारी की।
तीसरी महत्वपूर्ण बात जो कम लोगों को पता है, वह यह है कि शिवाजी महाराज ने दूसरी शादी की थी। उनकी दूसरी पत्नी सोयराबाई किसी भी तरह से संभाजी का अंत देखना चाहती थी और इसके लिए उन्होंने औरंगजेब तक को चिट्ठी लिख डाली थी।
इन तीनों बातों के माध्यम से फिल्म दर्शकों को संभाजी महाराज के जीवन के संघर्षों और उनके साथ हुए विश्वासघात की गहरी झलक दिखाती है।
विक्की कौशल का एक और दमदार अभिनय
फिल्म ’छावा’ का उल्लेख हर उस चर्चा में जरूर होगा जब विक्की कौशल के अभिनय का जिक्र आएगा। विक्की कौशल को ऐतिहासिक किरदार निभाने का जुनून है और इसके लिए वह अपने शरीर, रंग-रूप को पूरी तरह बदलने से नहीं हिचकते। इस बार, निर्देशक लक्ष्मण उतेकर ने विक्की के इस जुनून का पूरा फायदा उठाया है, जिनका नाम फिल्म में लक्ष्मण रामचंद्र उतेकर के रूप में परदे पर आता है।
विक्की कौशल ने संभाजी के किरदार में उसी तरह जान फूंकी है, जैसे उन्होंने पहले सरदार उधम सिंह और सैम मानेकशॉ पर बनी बायोपिक में की थी। इस फिल्म से उनके खाते में एक और राष्ट्रीय पुरस्कार जुड़ सकता है। हालांकि, फिल्म ’छावा’ मुख्य रूप से उन बिंदुओं पर केंद्रित है जहाँ संभाजी को युद्धरत दिखाया गया है। जब संभाजी युद्ध नहीं कर रहे होते, तो या तो अपने बचपन की डरावनी यादें सपने में देखते मिलते हैं या फिर अपनी पत्नी येसुबाई के संग वार्तालाप करते दिखते हैं।
फिल्म ’छावा’ में विक्की कौशल के अद्वितीय अभिनय कौशल को देखने के लिए दर्शकों में काफी उत्सुकता है, और यह फिल्म उनके फिल्मी करियर की एक महत्वपूर्ण कड़ी साबित हो सकती है।
रश्मिका मंदाना पर भारी पड़ीं दिव्या दत्ता
फिल्म ’छावा’ में रश्मिका मंदाना ने मराठा महारानी येसूबाई का किरदार निभाया है। यह किरदार हिंसक पुरुषों की संगिनी बनती जा रही है, जैसा कि उन्होंने ’पुष्पा’, ’एनिमल’, ’पुष्पा 2’ और अब ’छावा’ में निभाया है। फिल्म में येसूबाई का किरदार युद्ध से लौटे राजा की आरती उतारना, उसे युद्ध पर जाते समय तुकबंदी करना, काला टीका लगाना और डबडबाई आंखों से करुण रस उत्पन्न करना है। एक दृश्य में उन्हें औरंगजेब की सेना को रसद की आपूर्ति में बाधा डालने का आदेश देते हुए दिखाया गया है, लेकिन बस इतना ही।
दूसरी ओर, दिव्या दत्ता का किरदार रश्मिका के मुकाबले कहीं ज्यादा प्रभावशाली है। दिव्या ने शिवाजी की दूसरी पत्नी सोयराबाई का किरदार निभाया है, जो अपने बेटे को महाराज बनाने के लिए बेताब हैं। संभाजी आखिरी युद्ध में जाते समय उनके पैर छूकर आशीर्वाद लेते हैं और डबडबाई आंखों से उनकी हर इच्छा पूरी होने की कामना करते हुए जाते हैं। यहीं से फिल्म के क्लाइमेक्स की शुरुआत होती है, जैसे औरंगजेब आधी फिल्म तक क्रोशिये में ऊन फंसाकर कुछ बुनता रहता है, और फिर या तो ऊन खत्म हो जाता है या उसकी क्रोशिया बुनने वाली सिलाइयां आर्ट डिपार्टमेंट कहीं खो देती हैं।
कवि कलश के रूप में विनीत सिंह
फिल्म ’छावा’ में सहायक कलाकारों ने भी महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाई हैं। विनीत सिंह ने सबसे बेहतरीन काम किया है, जिन्होंने संभाजी महाराज के दरबारी कवि, कवि कलश की भूमिका निभाई है। उनकी कविताओं की पंक्तियां इरशाद कामिल ने लिखी हैं। विनीत सिंह ने क्लाइमेक्स में युद्ध भी लड़ा और संभाजी महाराज के अलावा औरंगजेब की कैद तक पहुंचने वाले दूसरे मराठा रहे।
हालांकि, संभाजी और कलश के बीच कविताई का मुकाबला आकर्षक नहीं है और इस दौरान दोनों का गला फाड़कर चीखना फिल्म को देखने का अनुभव कुछ असहज बनाता है।
आशुतोष राणा को उनके दमखम के अनुसार किरदार नहीं मिला। सेनापति के पद पर होने के बावजूद, वह कहीं भी व्यूह संरचना करते नहीं दिखे। डायना पेंटी को मानो अक्षय खन्ना के साथ सिर्फ फ्रेम बैलेंस करने के लिए रखा गया है।
वहीं, अक्षय खन्ना ने प्रोस्थेटिक से बने चेहरे की झुर्रियों और माथे पर नमाज पढ़ने के निशान के साथ खूब रंग जमाया है। हिंदी सिनेमा में दमदार खलनायकों की कमी को पूरा करने में यह प्रयोग कुछ नया मोड़ ला सकता है।
फिल्म के सभी किरदारों ने अपनी भूमिकाओं में जान डालने की पूरी कोशिश की है, जिससे फिल्म ’छावा’ एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक कथा के रूप में प्रस्तुत होती है।
ध्यान रखने योग्य बातें
फिल्म ’छावा’ देखने से पहले यह ध्यान रखें कि इसका क्लाइमेक्स काफी लंबा है और बेहद संवेदनशील दृश्य शामिल हैं। यदि दिल घबराए, तो बाहर आकर ताजी हवा खाना ना भूलें।
फिल्म के विषय पर विभिन्न दृष्टिकोण हो सकते हैं, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि ’छावा’ एक ऐतिहासिक फिल्म है जो दर्शकों को संभाजी महाराज के जीवन और उनकी वीरता से परिचित कराती है।
यह फिल्म न केवल उनके वीरता को दर्शाती है, बल्कि उनकी मानवीय गुणों और व्यक्तिगत जीवन को भी सामने लाती है।