दस साल पहले बिहार सरकार ने शराबबंदी लागू की थी। यह फैसला महिलाओं और सामाजिक संगठनों की मांग पर लिया गया था। उस समय इसे एक सामाजिक क्रांति माना गया। लेकिन आज, एक दशक बाद, यह कहानी उम्मीदों, संघर्षों और विरोधाभासों से भरी हुई है।

1. उम्मीदों की सुबह

जब शराबबंदी का ऐलान हुआ, तो गाँव-गाँव में खुशी की लहर दौड़ गई।

महिलाएँ राहत महसूस करने लगीं।

घरेलू हिंसा के मामले घटे।

परिवारों में खर्च का पैटर्न बदला—शराब पर खर्च होने वाला पैसा अब बच्चों की पढ़ाई और भोजन पर लगने लगा।

दरभंगा के रामेश्वर, एक रिक्शा चालक, बताते हैं कि पहले उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा शराब में चला जाता था। शराबबंदी के बाद उनके घर में शांति लौटी।

2. काले बाज़ार का अंधेरा

लेकिन धीरे-धीरे तस्वीर बदलने लगी।

शराबबंदी ने काले बाज़ार को जन्म दिया।

तस्करी के नेटवर्क खड़े हो गए।

नकली शराब से मौतें बढ़ीं।

सुनीता देवी की कहानी इसका उदाहरण है। उनके पति जहरीली शराब पीकर मर गए। वह कहती हैं, “सरकार ने शराब बंद की, पर मौतें नहीं रुकीं।”

3. आर्थिक कीमत

राज्य की अर्थव्यवस्था पर इसका गहरा असर पड़ा।

शराबबंदी से पहले बिहार को हर साल ₹3,142 करोड़ का राजस्व मिलता था।

दस साल में राज्य ने ₹30,000 करोड़ से अधिक का नुकसान झेला।

अनुमान है कि हर साल लगभग ₹20,000 करोड़ की आय खत्म हो गई।

इस नुकसान ने विकास योजनाओं और कल्याणकारी कार्यक्रमों पर असर डाला।

4. जनता की सज़ा

शराबबंदी का सबसे बड़ा बोझ आम जनता ने उठाया।

17.9 लाख से अधिक लोग गिरफ्तार हुए।

11 लाख से ज्यादा केस दर्ज हुए।

गरीब और हाशिए पर रहने वाले समुदाय सबसे ज्यादा प्रभावित हुए।

5. महिलाओं का दृष्टिकोण

महिलाओं ने शराबबंदी का सबसे अधिक समर्थन किया।

99% महिलाओं ने शराबबंदी का समर्थन किया।

घरेलू हिंसा में कमी आई।

परिवारों की आय और बच्चों की शिक्षा पर खर्च बढ़ा।

लेकिन आलोचना भी हुई।

NCAER अध्ययन ने बताया कि शराबबंदी के बावजूद महिलाओं के खिलाफ अपराधों में अपेक्षित कमी नहीं आई।

नकली शराब और नशे के अन्य रूपों ने नई चुनौतियाँ पैदा कीं।

6. सामाजिक बहस

JD(U) का पक्ष: पार्टी का कहना है कि शराबबंदी से घरेलू हिंसा में कमी आई और सामाजिक लाभ राजस्व नुकसान से कहीं अधिक हैं।

शोध संस्थानों का पक्ष: उनका कहना है कि शराबबंदी ने अपने मूल उद्देश्यों को पूरा नहीं किया और इसे हटाकर नियंत्रित बिक्री शुरू करनी चाहिए।

जनता की राय: महिलाओं और ग्रामीण परिवारों ने इसे राहत देने वाला कदम माना, लेकिन गरीब समुदायों को गिरफ्तारी और नकली शराब से सबसे अधिक नुकसान हुआ।