नई दिल्ली, 14 अगस्त 2026: दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (SAARC) लंबे समय से निष्क्रियता और राजनीतिक तनावों के कारण हाशिये पर चला गया था। लेकिन अब सदस्य देशों में इसे पुनर्जीवित करने की नई सोच उभर रही है। स्थापना: 1985 में SAARC की शुरुआत हुई थी, जिसका उद्देश्य दक्षिण एशिया के देशों के बीच आर्थिक, सांस्कृतिक और सामाजिक सहयोग बढ़ाना था। चुनौतियाँ: भारत-पाकिस्तान संबंधों में तनाव, राजनीतिक असहमति और सुरक्षा मुद्दों ने संगठन को कमजोर किया। निष्क्रियता: पिछले कुछ वर्षों से SAARC की बैठकें और पहलें लगभग ठप पड़ी थीं। पुनर्जीवन की सोच सदस्य देशों में यह समझ बढ़ रही है कि क्षेत्रीय सहयोग के बिना वैश्विक प्रतिस्पर्धा में टिकना मुश्किल है। आर्थिक सहयोग: व्यापार, ऊर्जा और तकनीकी साझेदारी को बढ़ावा देने की योजना। सांस्कृतिक जुड़ाव: शिक्षा, स्वास्थ्य और सांस्कृतिक आदान-प्रदान पर नया फोकस। सुरक्षा और स्थिरता: आतंकवाद और जलवायु परिवर्तन जैसी साझा चुनौतियों पर मिलकर काम करने की आवश्यकता। विशेषज्ञों की राय विशेषज्ञ मानते हैं कि SAARC का पुनर्जीवन दक्षिण एशिया को वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक मजबूत ब्लॉक बना सकता है। हालांकि, इसके लिए सदस्य देशों को राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर सहयोग की भावना को प्राथमिकता देनी होगी। SAARC का पुनर्जीवन सिर्फ़ एक संगठन की वापसी नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया के भविष्य की दिशा तय करने वाला कदम हो सकता है। अगर सदस्य देश मिलकर आगे बढ़ते हैं, तो यह क्षेत्रीय सहयोग का नया अध्याय होगा।